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रंगकर्मी समाज को ख़तरों से आगाह करेंः कैफी

जिन उद्देश्यों के तहत आज से लगभग 50 वर्ष पूर्व इप्टा का गठन हुआ था, आज उससे कहीं ज्यादा इसकी जरूरत है। अंग्रेज चले गये, आजादी भी मिल गयी लेकिन हमें कई लड़ाईयां अभी लड़नी हैं। इप्टा ने गीतों और नाटकों को हथियार बनाकर इस लड़ाई में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की है और आगे भी करती रहेगी।
इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा प्रख्यात शायर कैफी आज़मी ने आज यहाँ इप्टा के रंगकर्मियों के साथ बातचीत करते हुए यह बात कही। उन्होने कहा कि इप्टा की स्वर्ण जयन्ती हम अपनी पीठ ठोकने के लिए नहीं मना रहे हैं। आज हमारे सामने अहम सवाल खड़े हैं। आतंकवाद, अलगाववाद और फिरकापरस्ती को समाप्त करने और समाज को इन ख़तरों से आगाह करने तथा सभी संस्कृतिकर्मियों एवं रंगकर्मियों को इस मुहिम में सक्रिय भागीदारी के लिए उन्हें खासतौर से सचेत करना ही हमारा मुख्य उद्देश्य है।
श्री आज़मी ने कहा कि हमारे गाँव में ही वास्तव में हिन्दुस्तान की सच्ची तस्वीर है, जहाँ पर सेक्युलर निज़ाम और भाईचारे की जड़ें काफी मजबूत हैं। सियासी पार्टियों ने इन गाँवों में भी निहित स्वार्थों के चलते साम्प्रदायिकता का विषैला जहर फैला दिया। लोग भी इसके प्रभाव से बच नहीं सके। इसीलिए इप्टा ने गाँवों में अपनी गतिविधियाँ तेज कर दी हैं।
श्री आज़मी ने कहा कि हमारे पास आर्थिक संसाधन नहीं हैं लेकिन हम हिम्मत नहीं हारे हैं। ‘राष्ट्रीय सांस्कृतिक नीति’ के संदर्भ में सरकार को चेतावनी देते हुए उन्होने कहा कि शीघ्र ही सभी प्रगतिशील संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी संसद का घेराव करेंगे और ‘हक्सर कमेटी’ की रिर्पोट के साथ ही साथ ‘इप्टा’ के दसवें राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित अनुच्छेदों का पालन करने के लिए भी सरकार को बाध्य करेंगे। उन्होने कहा कि ‘राष्ट्रीय सांस्कृतिक नीति’ में जनचेतना और जनभावनाओं को भी शामिल किया जाना आवश्यक है।
इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आज़मी ने कहा कि इप्टा एक संस्था नहीं आन्दोलन है। आज के नाटकों और नाट्य प्रस्तुतियों पर दिन प्रतिदिन बढ़ रहे खर्चोंं और खतरों के प्रति रंगकर्मियों को आगाह करते हुए उन्होने कहा कि हमें अपनी प्रस्तुतियों के फार्म में परिर्वतन करना होगा। आज नुक्कड़ नाटक सांस्कृतिक आंदोलन की सशक्त विधा के रूप में स्थापित होता जा रहा है। विषय वस्तु और उसके फार्म में नित नये-नये प्रयोग हो रहे है जिससे नुक्कड़ नाटकों की वर्तमान समय में प्रसांगिकता और बढ़ी है। पिछले दिनों इप्टा की विभिन्न इकाईयों ने नुक्कड़ नाटकों में सामाजिक विकृतियों, रूढ़ियों, धार्मिक उन्माद से भ्रष्ट होती जा रही आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था को अपना निशाना बना कर आम जन की चेतना को आगे बढ़ाने का काम किया है।
मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था कटाक्ष करते हुए श्री आज़मी ने कहा कि पहले राजे रजवाड़े या ज़मीनदार अपने मनोरंजन और अन्य काम के लिए मुर्गे, भेड़ और पहलवान पाला करते थें, जिन्हें लड़ा कर वह प्रसन्न हुआ करते थें। लेकिन आज देश में नेता फिरकापरस्तों और लुटेरों को पालते है। जिससे देश का भविष्य खतरे में है।
श्री आज़मी ने कहा कि हमारी संस्कृति, हमारी विरासत हमारे आपसी सौहार्द की जड़ें इतनी ज्यादा मजबूत हैं कि उसे एक-दूसरे से अलग कर पाना बहुत मुश्किल है और ये फासिस्ट और साम्राज्यवादी विघटनकारी लोग अच्छी तरह यह जानते हैं इसीलिए समय समय पर वह चोट किया करते हैं।
दूरदर्शन पर आरोप लगाते हुए उन्होने कहा कि दूरदर्शन से इंटीग्रेशन का कोई काम नहीं हुआ है और सिर्फ सोप ओपेरा तथा अपसंस्कृति को ही बल मिला है।
रंगकर्मियों का आह्वान करते हुए श्री आज़मी ने कहा कि उनकी जिम्मेदारी समाज के प्रति पहले से कहीं ज्यादा है। समाज को भी उनसे अपेक्षायें हैं। रंगकर्मी भी जवाबदेह हैं। इसलिए रंगकर्मी इस आन्दोलन में अपनी नैतिक जिम्मेदारी कतई न भूलें।
(राष्ट्रीय सहारा दिनांक 18.07.1992 में प्रकाशित;   ज्योत्स्ना रघुवंशी से साभार)

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