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राष्ट्रीय नाट्य समारोह में छह नाटकः दिल को झकझोरने वाले नाटक

जब भी बिहार क्या हिन्दुस्तान में भी रंगमंच, नाट्यकर्म एवं साझा सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की चर्चा होगी बिहार इप्टा के अख़्तर भाईयों के नाम जुबान पर अपने आप आ जाएंगे। आज जबकि पश्चिम संस्कृति की चपेट में आकर हिन्दुस्तान की मूल संस्कृति कराह रही है तब भी परिर्वतन को स्वीकार करते हुए अख़्तर बंधुओं द्वारा मूल संस्कृति को ज़िन्दा रखने का काम क़ाबिल-ए-तारिफ़ है। इप्टा की पटना शाखा के दो नाटक ‘मुक्ति पर्व’ और ‘दूर देश की कथा’ का नाम पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र के इतिहास में इसलिए स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा क्योंकि ये दोनों लगातार दो वर्षों तक केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी (दिल्ली) द्वारा आयोजित ‘राष्ट्रीय नाट्य समारोह’ में प्रदर्शित हो चुका है।
‘दूर देश की कथा’ के लेखक जावेद अख़्तर ख़ाँ एवं निर्देशक परवेज़ अख़्तर ख़ाँ हैं। इस नाटक में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि धार्मिक कट्टरता सबसे पहले मानवीय संवेदनाओं को निगल जाती है। इस नाटक में निर्देशक ने कई धर्मों को माननेवाले हमारे देश के मौजूदा हालात के जीवंत चित्रण का प्रयास किया है।
नाटक में आदर्श धर्मनिरपेक्ष देश हिन्दुस्तान के विपरीत ध्रुव पर एक ऐसे ‘दूर देश’ की कल्पना की गई है जहाँ धर्म को हर मामले में हस्तक्षेप की छूट दी गई है। नाटक में एक ऐसे व्यंग्य की सृष्टि होती है जिसकी चोट भाईचारे की कब्र खोदनेवालों पर चोट तो करती ही है साथ-साथ हिन्दुस्तान के सुनहरे भविष्य के लिए निर्णायक कदम उठाने के लिए प्रेरित करती है। नाटक में प्रकाश-परिकल्पना तनवीर अख़्तर की है।
मुक्ति पर्वः नारी मुक्ति पर आधारित अविनाश चन्द्र मिश्र द्वारा यह नाटक भी महिलाओं पर हो रहे जुल्म और शोषण का जिक्र करते हुए उनकी मुक्ति के लिए शुरू होने वाले नए जमाने की समानता एवं संभावना के आन्दोलन की शुरूआत का संकेत दिया है।
मैथिली लोक कथा एवं पर्व पर ‘सामा चकेवा’ पर आधारित इस नाटक का मूल उद्देश्य नारी मुक्ति आन्दोलन है।
जब भी देश में नाटकों की चर्चा होगी तब उपरोक्त नाटकों के अलावा महाराष्ट्र इप्टा का नाटक ‘जुल्वा’, ‘डगर की माटी’, जबलपुर विवेचना (इप्टा) की ‘इसुरी’, लखनऊ इप्टा की ‘रामलीला’ आदि की चर्चा करना जरूरी है।
उल्लेखनीय बात यह है कि वर्ष 90 में आयोजित नाट्य समारोह में छह नाटकों में से तीन नाटक सिर्फ इप्टा के थे।
ये सभी नाटक इस बार कतरास में आयोजित राज्य सम्मेलन के आकर्षण के केन्द्र हैं।
(हिन्दी दैनिक ‘आवाज़’ द्वारा बिहार इप्टा के 10वें राज्य सम्मेलन; कतरासगढ़ के अवसर पर  प्रकाशित विशेष परिशिष्ट  दिनांक 9 नवम्बर, 1992 से साभार)

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